Tuesday, August 16, 2011

तिहाड़ जेल से अन्ना का सन्देश

मेरे देशवासियो,
मैं अन्ना का सन्देश लेकर जेल से बाहर आया हूँ. उनका कहना है कि देश की दूसरी आज़ादी की लड़ाई शुरु हो गई हैं. मैं चाहे जेल में रहूँ या जेल से बाहर मेरा अनशन तब तक जारी रहेगा जब तक संसद मैं सख्त लोकपाल नही पेश किया जाता.
अन्ना तब तक तिहाड़ जेल से बाहर नही आयेगे जब तक उन्हें बिना शर्त जे पी पार्क में सख्त लोकपाल के लिए अनशन करने की इजाजत नहीं दे जाती. अन्ना का सभी देशवासियों से अपील हैं कि आन्दोलन को जारी रखे. लेकिन विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण होना चाहिए. हो सकता है कि कुछ लोग शांति भंग करने कि कोशिश करे मगर हमारा आन्दोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण ही होगा.
दिल्ली के सभी लोग तिहाड़ जेल पहुंचे. आज अगर चूक गए तो ये मौका फिर नही मिलेगा.

Tuesday, August 2, 2011

'गरीब विरोधी सरकारी लोकपाल बिल' को संसद में आने से रोकें : लोकपाल बिल को संसद में रखे जाने से ठीक पहले अन्ना ने सांसदों को लिखी चिट्ठी

सेवा में,
माननीय सांसद महोदय                            
संसद
नई दिल्ली

विषय:  मंत्रिमंडल द्वारा पारित 'गरीब-विरोधी लोकपाल बिल' को संसद में पेश किए जाने से रोकने हेतु विनम्र निवेदन

आदरणीय सांसद महोदय,
आपमें से बहुत से भाइयों बहनों की तरह मैं भी लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में प्रयासरत हूं. आपमें से बहुतों की तरह मेरे प्रयास भी देश के आम लोगों, गरीब किसानों, मजदूरों, नौकरीपेशा लोगों की समस्याओं  को दूर करने के लिए समर्पित रहे हैं. और आपमें से बहुतों की तरह ही मैंने भी देखा है कि गरीब आदमी किस तरह भ्रष्टाचार की सर्वाधिक मार झेल रहा है.

आम गरीब आदमी के हितों की रक्षा के लिए ही मैंने लोकपाल के लिए बनी साझा ड्राफ्टिंग समिति में शामिल होना स्वीकार किया था. लेकिन मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने जिस लोकपाल बिल को मंजूरी दी है उसमें आम आदमी के भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने वाले अधिकतर मुद्दे नज़र अंदाज़ कर दिए गए हैं.

संसद में इतना कमजोर बिल लाना संसद और सांसद, दोनों का अपमान है, इसमें बहुत से ऐसे मुद्दे हैं ही नहीं जिन पर संसद में बहस होनी चाहिए थी. ऐसे कुछ प्रमुख मुद्दे हैं -

1. आम जनता की शिकायत के  निवारण के लिए एक प्रभावी व्यवस्था - जिसमें तय समय सीमा में किसी विभाग में एक नागरिक का काम न होने पर, दोषी अधिकारी पर ज़ुर्माने का भी प्रावधान है, ताकि गरीब लोगों को भ्रष्टाचार से राहत मिल सके.

2. लोकपाल के दायरे में गांव, तहसील और ज़िला स्तर तक के सरकारी कर्मचारियों को लाना- गरीबों, किसानों, मजदूरों और आम जनता को इन कर्मचारियों का भ्रष्टाचार अधिक झेलना पड़ता है. वैसे भी निचले स्तर के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार को लोकपाल के दायरे में लाए बिना आला अफसरों के भ्रष्टाचार की जांच करना भी संभव नहीं होगा.

3. केंद्र सरकार के लिए लोकपाल और राज्य सरकारों के लिए लोकायुक्त का गठन इसी कानून के तहत किया जाए. क्योंकि गरीब लोगों का वास्ता राज्य सरकार के कर्मचारियों से ही ज्यादा पड़ता है.

4. लोकपाल के कामकाज को पूरी तरह स्वायत्त बनाने के लिए वित्तीय स्वतंत्रता, सदस्यों के चयन एवं हटाने की निष्पक्ष प्रक्रिया हो.

5. इसी तरह कई और महत्वपूर्ण मुद्दे जिसमें लोकपाल की जवाबदेही बनाए रखते हुए, प्रधानमंत्री, सांसद और न्यायाधीश के भ्रष्टाचार की जांच को लोकपाल के दायरे में लाना, भ्रष्ट अफसरों को हटाने की ताकत लोकपाल को देने के मामले भी शामिल हैं.

लोकपाल के बारे में मुद्दे तो बहुत से हैं लेकिन मैं यहां विशेष रूप से भ्रष्टाचार के चलते गरीब आदमी की बदहाली की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं. सरकार ने जो लोकपाल  बिल तैयार किया है उसमें गरीब आदमी को भ्रष्टाचार से राहत दिलवाने का कोई इंतज़ाम है ही नहीं.

अगर सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती है तो मैंने 16 अगस्त से अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठने का ऐलान किया है. मेरा यह उपवास संसद के विरोध में नहीं बल्कि सरकार के कमजोर बिल के विरोध में होगा.

मैं उम्मीद करता हूं कि देश की संसद अपनी परंपरा और दायित्वों का निर्वाह करते हुए ऐसे गरीब विरोधी बिल को संसद में आने से रोकेगी.

सरकारी लोकपाल बिल और जनलोकपाल बिल के अंतर का तुलनात्मक विवरण आपके  संदर्भ हेतु इस पत्र के साथ संलग्न कर भेज रहा हूं.

भवदीय                                                                दिनांक: 2 अगस्त 2011

किशन बाबूराव हज़ारे (अन्ना हज़ारे)

Sunday, July 31, 2011

अन्ना के आन्दोलन पर नेताओं का अंट-शंट

कल शाम एनडीटीवी के  एक कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री नारायण सामी, अन्ना के जनलोकपाल बिल के बारे में  सफ़ेद झूंठ बोलते पकड़े गए.  उन्होंने कहा कि अन्ना लोकपाल के नौ सदस्यों को केंद्र और राज्यों के तमाम कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की जांच का काम दिलवाना चाहते हैं. जब उनके सामने साफ़ किया गया कि अन्ना तो लोकपाल की तरह राज्यों में भी लोकायुक्त बनाने की मांग कर रहे है. उनसे पूछा भी गया कि केंद और राज्यों का सारा काम लोकपाल को ही सौंपने की बात कहाँ की जा रही है? अन्ना के जनालोकपाल की किस क्लॉज़ में ऐसा लिखा गया है? उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था.

इसी कार्यक्रम में जब उनसे पूछा गया कि आप निचले स्तर के अधिकारियों को लोकपाल कानून के दायरे में क्यों नहीं ला रहे हैं, तो उन्होंने पहले कहा कि राशन, अस्पताल, स्कूल आदि का भ्रष्टाचार देखना राज्य सरकारों का काम है. फिर जब उनसे पूछा गया कि रेलवे, टेलीकाम, खाद्य, कृषि, स्वास्थ्य आदि तमाम  मंत्रालयों में निचले स्तर के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं. इनका भ्रष्टचार किसकी जांच के दायरे में आयेगा तो इसका भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
देश के नेता और बुद्धिजीवी लोग किस दुनिया में जी रहे हैं इसकी एक बानगी देखिए. एक रेडियो कार्यक्रम में राज्य सभा सांसद (और संविधान के बारे में कई किताबों के लेखक) सुभाष कश्यप ने कहा कि अन्ना और उनके साथियों को अगर कानून बदलवाने हैं तो चुनाव लड़कर आना चाहिए. उनसे पूछा गया कि "एक सामान्य नागरिक को ड्राइविंग लाइसेंस बिना रिश्वत दिए नहीं मिलता है, जो रिश्वत न दे वो धक्के खाकर बनवाए." तो क्या इसके खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए भी चुनाव लड़ना होगा. इसके जवाब में उन्होंने बड़ा बचकाना तर्क दिया. कहा कि "मेरे पास ड्राइविंग लाइसेंस है, मुझसे तो किसी ने रिश्वत नहीं मागी. ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट जैसी चीजों के लिए रिश्वत माँगने की कहानियाँ एकदम बकवास हैं." अब उन्हें कौन बताए कि संविधान पर दर्ज़नों किताबें लिखने से देश की हकीकत नहीं बदलती. बड़े अधिकारी, नेता और सांसदों से रिश्वत नहीं मांगी जाती. बल्कि उनके लिए और  उनकी वजह से मांगी जाती है.

Thursday, July 28, 2011

अखबार बांटने वाले लड़के

दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में अखबार बांटने वाले लड़कों ने कल हमारे पैसे इसलिए लौटा दिए क्योंकि "अन्ना जी हमारे लिए ही तो लड़ रहे है". अखबारों में पर्चे डालकर बांटने के लिए पहले तो उन्होंने खूब मोलभाव किया. उनके कार्डिनेटर ने पैसे ले भी लिए. लेकिन हमारे आने के बाद उनकी बैठक हुई. तय करके फोन किया गया, "आपसे तो गलती से पैसे ले लिए गए, आप प्लीज़ ये हमसे वापस ले जाइए, हम इस काम के पैसे नहीं ले सकते क्योंकि अन्ना जी हमारे लिए ही तो लड़ रहे हैं" ये शब्द सुनकर आँखों में आंसू आ गए. अधिकतर लड़के अलसुबह चार बजे उठकर अखबार बाँटते हैं, फिर कालेज जाते हैं. अखबार में पर्चे बांटना उनकी दिहाड़ी का हिस्सा है. उनका निर्णय दिल को छू गया और उम्मीद बंधी कि शायद सरकार आम आदमी की इस भावना को समझेगी.

लेकिन दोपहर आते आते यह उम्मीद टूट गई. लोकपाल से थोड़े बहुत बदलाव की उम्मीद लगाए बैठे देश के तमाम लोगों को सरकार ने बेशर्मी से झिड़क दिया. कह दिया कि "रिश्वतखोरी तो भ्रष्टाचार से अलग मामला है, अत: लोकपाल से बाहर. जिला, तहसील, निगम, पंचायत आदि में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए तो बहुत बड़ा विभाग बनाना पड़ेगा अत: वह भी लोकपाल से बाहर. प्रधानमंत्री, जजों और सांसदों के भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल करेगा तो लोकतंत्र, संविधान और संसद की गरिमा खतरे में पड़ जाएगी. अत: यह भी लोकपाल से बाहर" तब आम आदमी के लिए इस लोकपाल क्या बचा? झुनझुना?

आम आदमी रोजाना जो भ्रष्टाचार झेल रहा है, उसका निदान सरकारी लोकपाल बिल में नहीं है, इसकी चिंता न किसी अखबार में है, न टीवी पर.  जबकि यही देश की जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा है.  क्या आम आदमी को यह समझ में आया होगा कि सरकारी लोकपाल बिल में उसकी अपनी ज़िन्दगी के साथ कैसा खिलवाड़ किया गया है? क्या आज सुबह भी अखबार बांटने वाले उन लड़कों ने सोचा होगा कि 'अन्ना जी हमारे लिए ही तो लड़ रहे हैं"? 

लोकपाल के नाम पर जनता को धोखा

तय हो गया है कि सरकार जो लोकपाल बिल लाने जा रही है उसमें - 
  • रिश्वतखोरी से दुखी आम आदमी की शिकायतें लोकपाल नहीं सुनेगा. 
  • निचले स्तर के अधिकारियों व कर्मचारियों के भ्रष्टाचार  की जन लोकपाल के दायरे में नहीं आएगी 
  • नगर निगम, पंचायत, विकास प्राधिकरणों का भ्रष्टाचार इसकी जांच के दायरे में नहीं आएगा 
  • राज्य सरकारों का भ्रष्टाचार इसके दायरे में नहीं आएगा
  • प्रधानमंत्री, जजों और सांसदों का भ्रष्टाचार इसके दायरे में नहीं आएगा, यानि  २-जी, कैश फॉर वोट, कामनवेल्थ, आदर्श, येदुरप्पा, जैसे घोटाले इससे एकदम बाहर रखे गए हैं. 
  • ७ साल से पुराना कोई भी मामला इसकी जांच के दायरे में नहीं आएगा... अर्थात बोफोर्स, चारा घोटाला जैसा कोई भी घोटाला इसकी जांच के दायरे से पहले ही अलग कर  दिया गया है. 
  • लोकपाल के सदस्यों का चयन प्रधानमंत्री, एक मंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत एक बुद्धिजीवी, एक ज्यूरिस्ट, के हाथ में होगा क्योंकि इसके चयन के लिए जो समिति बनेगी उसमें एक बाकी के एक दो लोगो और होंगे, और उनकी कौन सुनेगा?
  • लोकपाल के सदस्यों को ही सारा काम करना होगा यानि सारा का सारा काम ८ सदस्य करेंगे, अफसरों के पास निर्णय लेने के अधिकार नहीं होंगे, इससे सारा का सारा काम दो-तीन महीने में ही ठप हो जाएगा.
ज़ाहिर है कि नेता एक अच्छा लोकपाल बिल नहीं ला सकते. क्योंकि अगर एक सख्त लोकपाल कानून बना तो देश के आधे से अधिक नेता दो साल में जेल चले जायेंगे और बाकी की भी दुकानदारियाँ बंद हो जाएंगी. इसलिए यह ज़रूरी हो गया है कि हम यानी देश के आम लोग इस कानून को बनवाने की पहल करें. 

अभी नहीं तो कभी नहीं

१६ अगस्त से एक सप्ताह की छुट्टी लीजिए  और कमर कसकर तेयार हो जाइए एक निर्णायक आन्दोलन के लिए. १६ अगस्त की सुबह तिरंगा लहराते हुए अपने अपने घर से निकालिए. 

Wednesday, July 27, 2011

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम अन्ना की चिट्टी

डा. मनमोहन सिंह जी,
प्रधानमंत्री , भारत सरकार,
नई दिल्ली

माननीय डा. मनमोहन सिंह जी,
मैं जब 5 अप्रैल को अनशन पर बैठा तो आपकी सरकार संयुक्त समिति बनाने के लिए तैयार हो गई। हम बड़ी उम्मीद और पूरी ईमानदारी के साथ संयुक्त समिति में शामिल हुए। चूंकि पूरा आंदोलन जन लोकपाल बिल को लेकर था, हमें उम्मीद थी कि संयुक्त समिति जन लोकपाल बिल की कुछ छोटी-मोटी बातों को छोड़कर बाकी बातें मान लेगी। दुर्भाग्यवश दो महीने चली इन बैठकों के बाद आज हम वहीं खड़े हैं जहां 5 अप्रैल को खड़े थे, जब अनशन चालू हुआ था। 5 अप्रैल को भी दो ड्राफ्ट थे - एक जनलोकपाल बिल और दूसरा सरकारी ड्राफ्ट। आज भी दो ड्राफ्ट हैं।
सरकारी लोकपाल बिल का जो मसौदा संयुक्त समिति के पांच मंत्रियों ने प्रस्तुत किया है, वह देश के साथ एक मज़ाक है। सरकारी लोकपाल बिल का दायरा इतना छोटा रखा गया है कि उसमें आम आदमी से जुड़ा किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं आता। पंचायत के कामों में भ्रष्टाचार, गरीबों के राशन की चोरी, भुखमरी का जीवन जी रहे मजदूरों की नरेगा-मजदूरी की चोरी.... एक आम आदमी से जुड़े किसी भी भ्रष्टाचार को सरकारी लोकपाल बिल में कोई जगह नहीं दी गई है। सरकार दावा करती है कि लोकपाल केवल बड़े स्तर का भ्रष्टाचार देखेगा। वहां भी सरकारी दावा खोखला नज़र आता है क्योंकि पिछले दिनों सामने आया कोई भी घोटाला सरकारी लोकपाल के दायरे में नहीं आता। आदर्श घोटाला, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, खाद्यानों का घोटाला, रेड्डी भाइयों का घोटाला, ताज कॉरीडोर घोटाला, झारखंड मुक्ति मोर्चा घोटाला, कैश फॉर वोट घोटाला, चारा घोटाला, कर्नाटक का भूमि घोटाला इत्यादि- इनमें से कोई सरकारी लोकपाल बिल के दायरे में नही आता। ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल उठता है कि सरकारी लोकपाल बिल के दायरे में आखिर आता क्या है ? क्या सरकारी लोकपाल दिखावा बनकर नहीं रह जाएगा? अभी तक सरकार की यही नीति रही है - नई-नई संस्थाएं बना दो लेकिन उन्हें कोई अधिकार और शक्ति न दो।
सरकारी लोकपाल भी उसी तरह की संस्था बनने जा रही है जिसके पास न अधिकार होंगे और न शक्ति। सारे राज्यों के कर्मचारियों को आपने इस कानून के दायरे से बाहर रखा है। हमारा कहना है कि केंद्रीय कर्मचारियों पर निगरानी रखने के लिए लोकपाल बनाया जाये और इसी कानून के तहत हर राज्य में लोकायुक्त बनाया जाए। प्रणव मुखर्जी साहब ने मीिंटंग में कहा कि राज्यों के मुख्यमंत्री इसके लिए तैयार नहीं हैं। पहली बात तो कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों से पूछने की ज़रूरत ही नहीं थी। क्योंकि यह मामला संविधान की  Concurrent  List में आता है। और इस पर केंद्र सरकार कानून बना सकती है। और दूसरी बात कि कांग्रेस शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लिखा था कि वे पार्टी हाईकमान की बात मानेंगे जो फैसला पार्टी हाईकमान लेगी वह उन्हें मंजूर होगा।
आप मुख्यमंत्रियों के पाले में गेंद डाल दे रहे हैं और मुख्यमंत्री आपकी तरफ। दोनों अपनी ज़िम्मेदारी एक दूसरे के ऊपर डाल रहे हैं। इससे भ्रष्टाचार से कैसे निपटा जा सकता है? हमें समझ में नहीं आता कि सरकार एक ही कानून के ज़रिए लोकपाल और लोकायुक्त बनाने में क्यों हिचक रही है? क्या राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार से निजात पाने के लिए जनता को अभी और कई सालों तक इंतजार करना पड़ेगा।
संयुक्त समिति की बैठकों में हमने बार-बार आपके मंत्रियों से कहा कि लोकपाल के दायरे में सारे सरकारी कर्मचारी आने चाहिए। एक आम आदमी को तो निचले स्तर के अधिकारियों के भ्रष्टाचार से रोज जूझना पड़ता है और उन्हीं को आपने बाहर रख दिया। भारत सरकार हर साल 30 हज़ार करोड़ रूपए से ज्यादा के राशन की सिब्सडी देती है जिसमें से 80 प्रतिशत की चोरी हो जाती है। स्कूल, अस्पताल, सड़क आदि के काम में तमाम तरह का भ्रष्टाचार होता है जो सरकारी लोकपाल बिल के दायरे में नहीं है। ये सारी चोरी निचले स्तर के अधिकारियों द्वारा ही की जाती है।
स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने कहा था कि आज सरकार के एक रुपए में से जनता तक मात्र 15 पैसा ही पहुंचता है और बाकी का 85 प्रतिशत या तो चोरी हो जाता है या जनता को उसका कोई लाभ नहीं मिलता। हमारा यह कहना है कि अगर सौ रुपए में से 25 पैसे (यानि एक रुपए में मात्र एक चौथाई पैसा के बराबर) भ्रष्टाचार रोकने के लिए खर्च कर दिए जाएं तो 15 प्रतिशत की जगह 100 प्रतिशत पैसे का लाभ सीधे जनता को मिलने लगेगा। आज़ादी के 62 सालों के बाद तक हमने प्रभावी भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र नहीं बनाया। और आज भी सरकार की इच्छा शक्ति नज़र नहीं आती।
आपके मंत्रियों का कहना था कि देश में केंद्र और राज्य सरकारों को मिलाकर सवा करोड़ से ज्यादा कर्मचारी हैं। इतने कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने के लिए तो ढेरों कर्मचारियों की ज़रूरत पड़ेगी। हमारा आपसे पूछना है कि क्या इस कारण से आप इन सबको भ्रष्टाचार करने को खुला छोड़ देंगे। हमारा देश बहुत बड़ा है। हमारे देश में ढेरों सरकारी कर्मचारी है। तो ज़ाहिर बात है कि इनके भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने के लिए भी ढेरों कर्मचारियों की ज़रूरत पड़ेगी।
मैं अतिविनम्रता के साथ आपसे जानना चाहता हूं कि एक आम आदमी भ्रष्टाचार की शिकायत लेकर आज कहां जाए? क्या उसे समाधान देना आपकी सरकार का फ़र्ज़ नहीं है? आज आज़ादी के 62 सालों के बाद अगर आपकी सरकार आम आदमी को भ्रष्टाचार से निजात दिलाने में अपने आपको असमर्थ पाती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
कानून की नज़रों में भ्रष्टाचार एक उतना ही घोर अपराध है जितना बलात्कार व हत्या। आज भ्रष्टाचार सरकार के रग-रग में छा गया है। कल यदि हत्या और बलात्कार की वारदातें इतनी बढ़ जाएं जितना आज भ्रष्टाचार बढ़ गया है, तो क्या आपकी सरकार का यही रवैया होगा? मेरा मानना है कि किसी भी सरकार का सर्वप्रथम कार्य समाज को अपराध से मुक्ति दिलाना है। किसी भी हालत में कोई भी सरकार यह नहीं कह सकती कि हम अपराध से मुक्ति दिलाने में असमर्थ है और यह ऐसे ही चलेगा।
आपकी सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कदम उठाने ही होंगे। और हम इससे कम के लिए तैयार नहीं है। मैं आम आदमी के भ्रष्टाचार का समाधान खोजने के लिए कटिबद्ध हूं। इसके लिए मैं और मेरे साथी बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं। आपकी सरकार के कुछ मंत्रियों ने और पार्टी के कुछ उच्च पदाधिकारियों ने धमकी दी है कि यदि 16 अगस्त से मैं अनशन पर बैठा तो हमारे आंदोलन को भी वैसे ही कुचल दिया जाएगा जैसे बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचला गया था। ऐसे उच्च पदाधिकारियों के इस तरह के बयान दुर्भाग्यपूर्ण हैं। ये बयान संविधान के िख़लाफ हैं क्योंकि संविधान इस देश के नागरिकों को बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इक्कठा होकर प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार देता है। इस तरह की धमकियां हमारे मौलिक अधिकारों का हनन हैं। लेकिन फिर भी यदि आपकी सरकार हमारे आंदोलन को कुचलती है तो हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं। हम गिरफ्तारियां देने के लिए तैयार हैं। लाठियां खाने को तैयार हैं। पर किसी भी हालत में हमारा हाथ नहीं उठेगा। पूरा आंदेालन अहिंसात्मक होगा।  हम हर बलिदान देने के लिए तैयार है। पर अब इससे और ज्यादा भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे।
ऐसा सुनने में आया कि आपकी सरकार अगस्त के पहले हफ्ते में संसद में लोकपाल बिल प्रस्तुत करेगी। हमारी आपसे यह विनती है कि संसद में जन लोकपाल बिल ही प्रस्तुत किया जाए। अभी जो सरकारी लोकपाल बिल का मसौदा है उसमें ढेरों कमियां है। उन कमियों की सूची इस पत्र के साथ संलग्न है। उसमें वो कमियां दूर करके ही संसद में उसे प्रस्तुत किया जाए।
संसद उस बिल पर क्या निर्णय लेती है - इसके लिए हम संसदीय प्रक्रियाओं का इंतजार करने के लिए तैयार हैं। लेकिन कम से कम आपकी सरकार एक सख्त कानून तो संसद में प्रस्तुत करे। यदि संलग्न सूची के मुताबिक सभी कमियों को दूर करके एक सख्त लोकपाल कानून संसद में 16 अगस्त से पहले प्रस्तुत नहीं किया गया, तो मेरे पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं रह जाएगा कि मैं 16 अगस्त से अनििश्चत कालीन अनशन के लिए फिर से बैठूं। जब मैंने 8 अप्रैल को पिछला अनशन तोड़ा था ऐसा बोला था कि यदि सरकार 15 अगस्त तक एक सशक्त कानून पारित नहीं करती तो मैं 16 अगस्त से फिर से अनशन पर बैठूंगा।
मुझे पूरी उम्मीद है कि आपकी सरकार जन भावनाओं के अनुरूप भ्रष्टाचार को रोकने के लिए संसद में एक सख्त कानून रखने का साहस दिखाएगी। मुझे आपके उत्तर का इंतजार रहेगा।

भवदीय





कि. बा. हज़ारे (अण्णा)

Friday, July 15, 2011

सत्ता के शब्दजाल और लोकपाल

देश में एक प्रभावी और स्वायत्त लोकपाल से कौन डर रहा है? भ्रष्टाचार से दुखी आम आदमी या भ्रष्टाचार में लिप्त सत्ता वर्ग और उसके कृपापात्र? जिस समय देश में "कैसा लोकपाल चाहिए" पर बहस होनी चाहिए, उस समय जानबूझकर ऐसे मुद्दे उठाए जाते हैं जो बहस को मूल मुद्दे से दूर ले जाएं. अन्ना हज़ारे नाम के मौजी फकीर के पीछे जिस तरह हर उम्र हर वर्ग के लोग खड़े हो रहे हैं उससे आखिर किसको डर लग रहा है? अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि अगर सरकार लोकपाल बिल में आम आदमी को भ्रष्टाचार से राहत दिलाने वाले प्रावधान नहीं लाती है तो 16 अगस्त से फिर अनशन होगा. अन्ना की बात को अनसुना कर सारी बहस को सिर्फ तीन शब्दों में अटका दिया जा रहा है - प्रधानमंत्री, संसद और जज. दुन्हाई दी जा रही है कि संसद की महिमा, प्रधानमंत्री की गरिमा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी. यह सत्ता का शब्दजाल है. 63 साल से लोकतंत्र के नाम पर जनता को छलने का काम इसी तरह के शब्दजालों के सहारे हुआ है. इस ओर जेपी ने उंगली उठाई थी अब अन्ना ने उठाई है. अन्ना की आवाज़ को अगर देश के आम आदमी ने सुन लिया तो यह शब्द जाल टूट जाएगा. अन्ना की मांग में प्रधानमंत्री, संसद और जजों के भ्रष्टाचार से भी ज्यादा अहमियत आम आदमी को रोज़ाना के भ्रष्टाचार से राहत दिलवाने को दी गई है. लेकिन इसे लेकर किसी दिग्गज या मंत्री की कोई टिप्पणी नहीं आती. "आम आदमी के साथ" के नारे वाली पार्टी आम आदमी के सवाल की ओर ध्यान नहीं देना चाहती.  इसीलिए छपटाहट और बौखलाहट है.  

Thursday, July 7, 2011

लोकपाल के बहाने उठे कुछ सवाल?


देश में नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए एक स्वतंत्र लोकपाल बनवाने की मांग उठी तो लगभग पूरी नेता बिरादरी एक हो गई लगती है. सबको संसद की गरिमा याद आ रही है. सांसदों की भूमिका याद आ रही है. कहा जाने लगा है कि कानून बनाने का काम तो सांसदों का है. पशुओं के चारे को पचा जाने तक में माहिर कुछ नेता तो इसे पूरे रानजीतिक तंत्र के खिलाफ साज़िश तक करार देने लगे हैं. लोकतंत्र और संसद की गरिमा के बहाने भ्रष्ट व्यवस्था की पैरवी की कोशिशों पर कुछ सवाल उठने लाज़मी हैं. 
सबसे अहम सवाल यह है कि संसदीय लोकतंत्र की परंपराएं क्या कोई अंधविश्वास हैं? यह ठीक है कि लोकतंत्र में कानून बनाने का अधिकार सांसदों का  है लेकिन, जब भ्रष्टाचार का दीमक लोकतंत्र की जड़ खोद रहा हो, और इसके खिलाफ लोकपाल कानून 42 साल से संसद में पड़ा सड़ रहा हो, तो भी लोग महज़ इसलिए चुप बैठे रहें कि कानून बनाना तो सांसदों का काम है. जनता आवाज़ उठाए तो उसे कहा जाए कि अगर कानून बनाना है तो जाओ पहले चुनाव जीत कर आओ. इससे बड़ा मज़ाक कानून बनाने के एकाधिकार के साथ क्या हो सकता है कि हमारे सांसद 42 साल से एक कानून को दबाए बैठे हैं? क्या यह लोकतंत्र के मंदिर यानि संसद का अपमान नहीं है. 

Thursday, June 23, 2011

जन लोकपाल बनाम सरकारी लोकपाल


  • सरकारी लोकपाल कानून में कलेक्टर, पुलिस, राशन, अस्पताल, शिक्षा, सड़क, उद्योग, पंचायत, नगर पालिका, वन विभाग, सिंचाई विभाग, लाईसेंस, पेंशन, रोड़वेज़ जैसे तमाम विभागों के भ्रष्टाचार को जांच से बाहर रखा गया है। 
  • २ जी, कॉमनवेल्थ, आदर्श जैसे घोटालें इसके बावजूद चलते रहेंगे क्योंकि प्रधानमंत्री इसकी जाँच से बाहर रहेंगे और मंत्री या अफसरों के खिलाफ जाँच बड़ी मुश्किल से होगी।
  • सरकारी लोकपाल कानून के दायरे में किसी ज़िले में केवल केन्द्र सरकार के विभागों के डायरेक्टर रैंक के अधिकारी आएंगे। यानि जिस ज़िले में डाक, रेलवे, इन्कम टैक्स, टेलीकॉम आदि विभाग का कोई दफ्तर यदि हुआ तो लोकपाल केवल उसके सबसे बड़े अधिकारी के भ्रष्टाचार की जांच कर सकेगा। उसके अलावा केन्द्र या राज्य सरकार का कोई भी कर्मचारी इस कानून के दायरे में नहीं आएगा। 
  • पूरे देश में यह कानून केन्द्र सरकार के कुल 65000 सीनियर अधिकारियों पर लागू होगा। इसके अलावा पूरे देश के करीब 4.5 लाख एनजीओ और असंख्य गैर पंजीकृत समूह (बड़े बड़े आन्दोलनों से लेकर शहरों गांवो के छोटे छोटे युवा समूह तक) इस कानून की जांच के दायरे में होंगे। 
  • सरकारी लोकपाल कानून में भ्रष्टाचार के दोषी के लिए न्यूनतम सज़ा 6 महीने की जेल है। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने वाले को (शिकायत गलत पाए जाने पर) मिलने वाली सज़ा दो साल है। 
  • यदि कोई सरकारी कर्मचारी, अपने खिलाफ शिकायत करने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाना चाहेगा तो वकील की फीस व अन्य खर्चे सरकार भरेगी।
  • बईमान, नकारा आदि सरकार के करीबी लोग  लोकपाल बनकर बैठ जायेगे।

लोगों के दिमाग से अन्ना को कैसे निकालेगी सरकार

शाम्भवी शर्मा उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में रहती है. ८ जून को जब अन्ना हजारे के साथ हज़ारों लोग राजघाट पर अनशन पर बैठे तो उसके परिवार ने अपने घर पर ही उपवास किया. शाम्भवी के लिए उपवास एक व्रत था स्वयं से.  इसलिए मां के बार कहने के बाद भी उसने पूरे दिन पानी तक नहीं पीया. क्यों? "क्योंकि मैं अन्ना हजारे के साथ अनशन पर थी, अपने देश के भविष्य के लिए".

कांग्रेस पार्टी के नेता और सरकार अगर अपनी ताकत दिखाएंगे तो १६ अगस्त को अन्ना हजारे और हम सबको जंतर मंतर से खदेड़ सकते हैं. दिल्ली से भगा सकते हैं. जेल में डाल सकते है. यानी हर वह काम कर सकते हैं जिसे वे 'सबक सिखाना' कहते हैं. लेकिन शाम्भवी शर्मा जैसी एक बच्ची के मन से अन्ना और उनके आन्दोलन को कैसे निकालेंगे? और याद रहे शाम्भवी शर्मा अकेली नहीं है. अन्ना हजारे के साथ लाखों हैं. लोकपाल कानून के लिए आन्दोलन में अन्ना के साथ जो लोग जुड़ रहे हैं उनमें से हरेक का जज्बा यही है. इस जज्बे को कैसे निकालेगी यह सरकार और कांग्रेस के नेता.
हमें जंतर मंतर पर जाने से रोक सकते है. लेकिन गाज़ियाबाद के उस व्यापारी को कैसे रोकेंगे जिसने ८ जून को अपनी ही दुकान पर तख्ती लगा ली - " अन्ना के साथ आज मैं भी उपवास पर हूँ". पुलिस की लाठी या अन्ना और उनके साथियों के खिलाफ मुकदमे या फर्जी प्रचार चलाकर इसे नहीं रोका जा सकता. सरकार इसे अगर रोकना चाहती है तो इसका एक ही उपाय है. अन्ना जैसा लोकपाल कानून मांग रहे हैं वैसा कानून बना दो.

Tuesday, June 21, 2011

'लोकपाल' और 'जोकपाल' के बीच हम

अब संघर्ष जन 'लोकपाल' और सरकारी 'जोकपाल' के बीच है.

जनलोकपाल में कोशिश  है कि ग्राम पंचायत, नगर पालिका से लेकर प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री तक के काम में कहीं भी भ्रष्टाचार है तो दोषियों को जेल भेजा जाए. रोज़मर्रा के सरकारी कामकाज में रिश्वतखोरी से दुखी आम आदमी को राहत मिले. व्यवस्था ऐसी हो कि भ्रष्टाचारी गलत काम करने से पहले दस बार सोचे कि जेल जाना तय  है.  

जोकपाल में कोशिश है कि राशन कार्ड, ड्राईविंग लाईसेंस, पासपोर्ट  आदि बनवाने में रिश्वतखोरी को न छुआ जाए. सड़क, बिजली, स्कूल अस्पताल आदि में जो भ्रष्टाचार है उसे न छुआ जाए. और  न ही प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री या सांसदो के भ्रष्टाचार को छुआ जाए. केवल केंद्र सरकार के मंत्रालयों  में बैठे चन्द अफसर  या मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की औपचारिकता कर ली जाए.

जनलोकपाल के समर्थन में देश की आम जनता है. जो  अन्ना हज़ारे के साथ खड़ी है. जोकपाल के समर्थन में देश की तमाम भ्रष्ट ताकतें हैं जो सरकार में बैठे भ्रष्ट लोगों के साथ खड़ी हैं. जनलोकपाल कानून बनता है तो हमारा और हमारी आने वाली पीढि़यों का भविष्य  बच सकता है. लेकिन जोकपाल कपाल कानून बनता है तो  जनता की उम्मीदें एक बार फिर कम से कम 30-35 साल के लिए टूट जाएंगी और आम आदमी के लिए हर रोज़ नई समस्याएं इसी तरह खड़ी होती रहेंगी.

अब तय हमें करना है. हम कहां खडे़ होते हैं. 

कुछ महीने के लिए अपनी नौकरी कैरियर, दुकान, मकान छोड़कर लोकपाल बनवाने के लिए सड़क पर उतरेंगे या फिर किसी बहाने से खुद को समझा बुझाकर बन्द कमरे में चादर ढक  कर सा जाएंगे. लोकपाल बन गया तो ठीक नहीं तो चाय की चुस्कियों के साथ कभी कभी जोकपाल को कोस लिया करेंगे. 

अब ये आन्दोलन इस मोड़ पर पहुँच गया है कि जनलोकपाल का कानून बनना न बनना सरकार पर नहीं करेगा. यह निर्भर करेगा की किस शहर में कितने लोग सड़को पर उतरते हैं और जेल जाने के लिए तैयार होते हैं. 
वक्त महज़ १५-२० दिन का है. उसके बाद तो संमीक्षा करने का ही मौक़ा मिलेगा.

Friday, June 10, 2011

क्या लोकपाल सिर्फ उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार की जांच करे?

बहुत से जाने माने लोगों का कहना है कि लोकपाल केवल उच्चस्तरीय बड़े भ्रष्टाचार पर केन्द्रित रहे.
भारत में एक अनोखा भ्रष्टाचार निरोधी तन्त्र है जो बुरी तरह से बिखरा हुआ है. भ्रष्टाचार के एक ही मामले में विभागीय विजिलेंस विभाग निचले स्तर के कर्मचारियों की भूमिका की जांच करता है, सीवीसी बड़े अधिकारियों की भूमिका की जांच करता है, सीबीआई इसके अपराधिक पहलू की जांच करती है, राज्यों में लोकायुक्त नेताओं की भूमिका की जांच करते हैं. इस तरह एक ही मामले में कई एजेंसियों की जांच और पूछताछ एक साथ चलती है. यह किसी मामले को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है. निचले कर्मचारी, बड़े अफसर, नौकरशाह या नेताओं का भ्रष्टाचार अलग अलग होता है क्या?

Tuesday, June 7, 2011

क्या न्यापालिका को लोकपाल के दायरे में होना चाहिए?

इस सवाल का जवाब देने से पहले यह देखते हैं कि जनलोकपाल बिल में क्या प्रस्तावित किया जा रहा है, इसकी क्या आलोचना की जा रही है और इस पर हमारा जवाब क्या है.

समस्या कहां है?

आज यदि सुप्रीम कोर्ट अथवा हाई कोर्ट के किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो प्रधान न्यायधीश की अनुमति लिए बिना उसके खिलाफ न तो एफ.आई.आर दर्ज हो सकती है और न ही जांच शुरू हो सकती है. अभी तक का अनुभव बताता है कि किसी जज के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश किए जाने के बाद भी प्रधान न्यायधीश किसी जज के खिलाफ इस तरह की इजाज़त देने से हिचकिचाते रहे हैं.

यहाँ तक कि अपनी इमानदारी के लिए प्रतिष्ठित प्रधान न्यायधीशों ने भी ऐसे मामलों में इजाज़त नहीं दी हैं. खुद पी. चिदम्बरम ने कोलकाता हाई कोर्ट के जज सस्टिस सेन गुप्ता के खिलाफ एफ. आई आर दर्ज करने की इजाज़त मांगी थी. इजाज़त देश के प्रधान न्यायधीश जस्टिस वेंकटचेलैय्या से मांगी गई थी, जो अपनी निष्ठा के लिए जाने जाते हैं. लेकिन जस्टिस वेंकट चेल्य्या ने भी इजाज़त नहीं दी. सवाल उठता है कि क्या जस्टिस सेनगुप्ता के खिलाफ पर्याप्त सबूत थे? सबूतों का अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिटायर होते ही जस्टिस सेनगुप्ता के यहाँ छापे डाले गए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. क्योंकि इस वक्त प्रधान न्यायधीश की इजाज़त की आवश्यकता नहीं थी.

लोकपाल और प्रधानमन्त्री

सरकार प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना चाहती है. यानि अगर प्रधानमन्त्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो उनकी जंाच नहीं की जा सकती. इसका अर्थ है प्रधानमन्त्री को किसी भी प्रकार की जांच अथवा मुकदमे से मुक्त होगा.

यह संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होगा क्योंकि संविधान प्रधानमन्त्री को इस तरह की कोई प्रतिरक्षा नहीं देता है. संविधान इस प्रकार की प्रतिरक्षा केवल राष्ट्रपति को देता है. संविधान निर्माताओं ने सर्वोच्च पद पर किसी अस्थिरता से बचने के लिए यह व्यवस्था की है. प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखकर सरकार संविधान अनौपचारिक रूप में संविधान में ही संशोधन कर दे रही है.

Monday, May 30, 2011

जन लोकपाल: ``सुपरकॉप´´ नहीं ``सुपरहिट´´ होगा



कुछ लोग भ्रम फैलाने में लगे हैं कि जनलोकपाल एक ``सुपरकॉप´´ यानि एक सर्वशक्तिमान संस्था बन जाएगा जो लोकतन्त्र कमज़ोर करेगा 
तो क्या हम एक कमज़ोर लोकपाल चाहते हैं जो भ्रष्टाचारियों के सामने गिड़गिड़ाता रहे कि भाई अपना भ्रष्टाचार हमें बता दो?

संसदीय लोकतन्त्र में चुने हुए प्रतिनिधियों की गरिमा और महत्व सर्वोपरि रहना चाहिए। प्रस्तावित जनलोकपाल कानून में इसे कम करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वस्तुत: लोकपाल का अर्थ ही है लोकतन्त्र की पालना कराने वाला। प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के ड्राफ्ट 2.2 (देखने के लिए क्लिक करें ) और उसके बाद मिल रहे सुझावों के आधार पर तैयार प्रमुख बिन्दुओं को अगर ज़रा भी ध्यान से देखेंगे तो समझ आ जाता है कि यह कानून लोकपाल को नहीं बल्कि देश के आम आदमी को ताकतवर बनाता है। 

चाहे लोकतन्त्र हो या कोई और तन्त्र, कुल मिलाकर लोगों के लिए है, किसी अंध्विश्वास का नाम लोकतन्त्र नहीं है। अगर किसी तन्त्र में अपनाई गई परम्पराओं ने लोगों को कमज़ोर किया है तो उन्हें ठीक करते हुए लोगों को और ताकतवर बनाने की ज़रूरत है। क्योंकि कोई भी तन्त्र आखिरकार है तो लोगों के लिए ही। दुर्भाग्य से हमारे लोकतन्त्र में एक सांसद, विधायक खुद को जनता का मालिक समझता है। अगर वह मंत्री हो गया तो खुद को खुदा समझने लगता है। जनता के टैक्स के पैसे पर पलने वाला पूरा का पूरा तन्त्र आम आदमी को शोषित कर रहा है। इसकी बानगी के लिए देश के दूरदराज़ के इलाकों तक जाने की ज़रूरत नहीं है। चमचमाती दिल्ली में हर सरकारी दफ्तर के सामने इस तरह के लोग मिल जाएंगे जो इस तन्त्र के खुदा बन जाने के शिकार हैं। इस तन्त्र में बैठे लोगों की मनमानी और भ्रष्टाचार की बदौलत आज आम आदमी लोकतन्त्र में विश्वास खोता जा रहा है। 

Tuesday, May 17, 2011

जन लोकपाल कानून को लेकर भ्रम


लोकपाल को लेकर लोगों को भ्रमित करने का काम भी शुरू हो गया है. चर्चा चलाई जा रही है कि लोकपाल बनेगा तो लोकतन्त्र नहीं रहेगा. तानाशाही आ जाएगी. एक ताकतवर लोकपाल लोकतान्त्रिक तरी से बनी संस्थाओं के ऊपर हो जाएगा... आदि आदि. ऐसी अधिकतर चर्चा उन लोगों द्वारा फैलाई जा रहीं हैं जो अभी तक कानून की खामियों का फायदा उठाकर खुलेआम भ्रष्टाचार में लगे थे. प्रस्तावित लोकपाल की लोकिप्रयता को देखते हुए उन्हें पहली बार डर पैदा हुआ है कि अगर यह कानून बन गया तो जनता उन्हें जेल भिजवाने लगेगी. इस डर से तिलमिलाए लोग, जिसमें नेता और अफसरों सहित तरह तरह के लोग शामिल हैं, अब आम जनता को भ्रमित करने में लग गए हैं. इनका सीधा सा मकसद है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कानून की मांग का जो माहौल अन्ना हज़ारे के उपवास के दौरान बना है, उसे कमज़ोर कर दिया जाए. कहीं भावुक रूप से तो कहीं लोगों को डराकर कमज़ोर लोकपाल के पक्ष में माहौल बना दिया जाए. 

मोटे तौर पर, लोकपाल कानून बनवाने के दो मकसद हैं - पहला मकसद है कि भ्रष्ट लोगों को सज़ा और जेल सुनिश्चित हो. भ्रष्टाचार, चाहे प्रधानमन्त्री का हो या न्यायधीश का, सांसद का हो या अफसर का, सबकी जांच निष्पक्ष तरीके से एक साल के अन्दर पूरी हो. और अगर निष्पक्ष जांच में कोई दोषी पाया जाता है तो उस पर मुकदमा चलाकर अधिक से अधिक एक साल में उसे जेल भेजा जाए. दूसरा मकसद है आम आदमी को रोज़मर्रा के सरकारी कामकाज में रिश्वतखोरी से निजात दिलवाना. क्योंकि यह एक ऐसा भ्रष्टाचार है जिसने गांव में वोटरकार्ड बनवाने से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक में लोगों का जीना हराम कर दिया है. इसके चलते ही एक सरकारी कर्मचारी किसी आम आदमी के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करता है.

Monday, May 16, 2011

अन्ना को अन्ना रहने दो!


क्या अन्ना गाँधी हैं? सवाल बार-बार उठाया जा रहा है। लेकिन क्या अन्ना ने कभी कहा कि ``मैं गाँधी हूं´´? जब उनसे कुरेद कुरेद कर पूछा भी गया तो उन्होंने यही कहा कि मैं तो गाँधी के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हूं। इतने स्पष्ट जवाब के बाद भी कई अखबारों और पत्रिकाओं ने अपने संसाधन और कागज़ इस पर खराब कर डाले हैं। कई लोगों ने अपना दिमाग लगाकर लेख लिखे हैं ताकि कुछ अलग कहा जा सके। समीक्षा हो रही है कि अन्ना गाँधी हैं या नहीं! अन्ना क्यों गाँधी हैं, क्यों नहीं है!...

क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि हमारे देश के बुद्धिजीवी वर्ग को कोई बात मौलिकता के साथ स्वीकार नहीं होती। हर बात में सापेक्षता खोजने की कोशिश हमारे ज़हन में इस तरह घर कर गई है कि इसके अलावा हमें कुछ अच्छा नहीं लगता। `उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज्यादा सफेद क्यों´ का विज्ञापन हमारी सोच का विज्ञापन बन गया है। `पड़ोसी की गाड़ी और पड़ोसन की साड़ी´ से दिन रात परेशान रहने वालों को अन्ना ने कुछ और मुद्दे दे दिए हैं। `क्या अन्ना गाँधी हैं, उससे कम हैं या ज्यादा है? क्या ये आज़ादी की लड़ाई जैसा है? जेपी के आन्दोलन से कम है, ज्यादा है....? क्या ये तहरीर चौक जैसा था?

यह ठीक ऐसा ही है कि आप कश्मीर की वादियों में जाएं और वहां की खूबसूरती का आनन्द उठाने की जगह अपने दिमाग को तुलना में उलझा दें कि यह स्विटज़रलैण्ड से कितना कम है-ज्यादा है। अमेरिका से तुलना करने लगें... और जब लौट कर आएं तो समझ में नहीं आता कि हम प्राकृति खूबसूरती का नज़ारा देखने गए थे या तुलनात्मक अध्ययन करने।

Saturday, May 14, 2011

जन लोकपाल कानून (भाग-2)


शिकायत निवारण प्रणाली

21. नागरिक घोषणापत्र:
(1)   प्रत्येक लोक प्राधिकरण इस अधिनियम के प्रभाव में आने के अधिकतम एक साल के भीतर नागरिक अधिकार पत्र की तैयारी और कार्यान्यवन सुनिश्चित करेगा.
(2)   प्रत्येक नागरिक घोषणापत्र में उस लोक प्राधिकरण की कार्य की प्रतिबद्धता के बारे में, प्रत्येक कार्य प्रतिबद्धता को सुनिश्चित करने के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों के बारे में और इसके लिए समय सीमा के बारे में स्पष्ट विवरण होगा.
(3)   प्रत्येक लोक प्राधिकरण एक प्राधिकारी नामित करेगा, जिसे लोक शिकायत निवारण अधिकारी कहा जाएगा, जिसके पास शिकायतकर्ता नागरिक घोषणापत्र के उल्लंघन की शिकायतें लेकर जाएंगे.
यह भी कि लोक प्राधिकरण ऐसी हर जगह पर, कम से कम एक लोक शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करेगा जहां उसका कार्यालय होगा.
लोक शिकायत निवारण अधिकारी विभाग का प्रमुख होगा या उससे एक दर्जे नीचे का अधिकारी, लेकिन अगर किसी जगह विभाग प्रमुख नहीं है तो वहां के सबसे वरिष्ठ अधिकारी को लोक शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त किया जाएगा. 
(4)   प्रत्येक लोक प्राधिकरण साल में कम से कम एक बार अपने मुख्य सतर्कता अधिकारी की मौजूदगी में सार्वजनिक बैठक कर नागरिक घोषणापत्र की समीक्षा कर और उसमें संशोधन करेगा. 
(5)   लोकपाल किसी लोक प्राधिकरण को अपने नागरिक घोषणापत्र में परिवर्तन का आदेश निर्गत कर सकेगा और लोक प्राधिकरण को आदेश मिलने के एक सप्ताह के भीतर उक्त परिवर्तन करना होगा.    
प्रावधानों के मुताबिक इस तरह के परिवर्तन को लोकपाल की कम से कम तीन सदस्यीय पीठ द्वारा अनुमोदित कराना होगा.
इस तरह के परिवर्तन में नागरिक घोषणापत्र की मौजूदा समय सीमा बढ़नी या वर्णित कार्यों की संख्या घटनी नहीं चाहिए. 

21क. शिकायत प्राप्ति व निपटान:

(1) किसी लोक प्राधिकरण का मुख्य सतर्कता अधिकारी उस लोक प्राधिकरण से सम्बन्धित शिकायतों को प्राप्त  करने एवं निपटाने के लिए उतनी संख्या में सतर्कता अधिकारी घोषित करेगा जितना उचित लगे, जो कि अपीलीय शिकायत अधिकारी के तौर पर जाने जाएंगे। 
(2) यदि कोई नागरिक जन शिकायत निवारण अधिकारी के समक्ष शिकायत करने के एक माह के अन्दर शिकायत का सन्तुष्टिपूर्ण निवारण प्राप्त करने में विफल रहता है तो, अपीलीय शिकायत अधिकारी के समक्ष शिकायत कर सकता है।
परन्तु शिकायत की गम्भीरता एवं तात्कालिकता पर विचार करते हुए अपीलीय शिकायत अधिकारी को यदि महसूस होता है कि, ऐसा करना जरूरी है तो, वह ऐसी शिकायत को जल्द भी स्वीकार करने का निर्णय कर सकता है।
(3) यदि शिकायत उस लोक प्राधिकरण के नागरिक चार्टर में विर्णत मुद्दे से सम्बन्धित नहीं है तो, अपीलीय शिकायत अधिकारी, शिकायत प्राप्त करने के एक माह के अन्दर, या तो शिकायत को नामंजूर करने या आदेश में विर्णत तरीके से उस समय के अन्दर शिकायत के समाधान के लिए लोक प्राधिकरण को निर्देश देते हुए एक आदेश जारी करेगा.
     परन्तु यह भी कि शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर दिये बगैर कोई शिकायत नामंजूर नहीं की जाएगी.
(4) अपीलीय शिकायत अधिकारी को प्रेषित शिकायत को सतर्कता दृष्टिकोण वाली शिकायत समझा जाएगा, यदि: 

क. शिकायतकर्ता, सिटिज़न चार्टर में वर्णित मुद्दों के लिए, जन शिकायत निवारण अधिकारी से सन्तुष्टिपूर्ण निवारण पाने में विफल रहा है, अथवा, और
ख. सिटीज़न चार्टर में विर्णत मुद्दों से अतिरिक्त के लिए, यदि इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (3) में  निर्धारित अपीलीय शिकायत अधिकारी के आदेश का उल्लंघन होता है।

(5) इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (4) में वर्णित, हरेक मामले को निम्न तरीके से समाधान किया जाएगा:

क. सुनवाई का वाजिब अवसर देने के बाद, अपीलीय शिकायत अधिकारी शिकायकर्ता की शिकायत को निर्धारित समय में सन्तुष्टिपूर्ण निवारण में विफलता के लिए जिम्मेदारी तय करते हुए आदेश जारी कर सकता है और उस लोक प्राधिकरण के आरेखण एवं संवितरण अधिकारी को आदेश में विर्णत तरीके से उस अधिकारी के वेतन से जुर्माने की रकम वसूलने का निर्देश दे सकता है, अपीलीय शिकायत अधिकारी के निर्देश अनुसार, वह जुर्माना सिटीज़न चार्टर में निदिर्ष्ट समय सीमा पूरा होने के दिन से या उस शिकायत के निवारण के लिए इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (3) के अन्तर्गत जारी आदेश में निदिर्ष्ट समय सीमा के दिन से गणना करके प्रतिदिन विलम्ब के लिए रुपये 250 से कम नहीं होना चाहिए।
ख.कथित अधिकारियों के वेतन से वसूली गई रकमों को शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति के लिए आरेखण एवं संवितरण अधिकारी को निर्देश देना।

(6) इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (5) की उपधारा(क) के अन्तर्गत जारी किए जाने वाले आदेश में उल्लेखित अधिकारियों को स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि उन्होंने नेकनीयती से कार्य किया है और उनका कोई भ्रष्ट उद्देश्य नहीं है। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं तो, अपीलीय शिकायत अधिकारी कथित अधिकारियों के खिलाफ केन्द्रीय नागरिक सेवा विनियम के अन्तर्गत जुर्माना लगाने की सिफारिश करेगा.   

21ख. वार्षिक अखण्डता लेखा परीक्षण : समय-समय पर लोकपाल की ओर से तय दिशानिर्देशों के अनुसार लोकपाल हरेक विभाग की वार्षिक अखण्डता लेखा परीक्षण करेगा।


बड़े या छोटे दण्ड का अधिरोपण 

21ग. कदाचार के आरोप की शिकायतें सतर्कता अधिकारी के पास की जाएंगी. इन शिकायतों पर वही जांच भी करेगा.
21घ. अनुच्छेद 21क के अन्तर्गत सतर्कता दृष्टिकोण वाली कदाचार एवं जन शिकायतों के आरोप निम्न तरीके से हल किये जाएंगे:

(1)   सतर्कता अधिकारी ऐसे हरेक मामले में उसे प्राप्त करने के तीन माह के अन्दर जांच करेगा और मुख्य सतर्कता अधिकारी को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
(2)   रिपोर्ट प्राप्त करने के एक पखवाड़े के अन्दर, मुख्य सतर्कता अधिकारी उप मुख्य सतर्कता अधिकारियों का तीन सदस्यीय पीठ गठित करेगा, इस पीठ में उपधारा (1) के अन्दर जांच करने वाला अधिकारी ‘शामिल नहीं होगा.
(3)   यह पीठ जांच करने वाले सतर्कता अधिकारी, शिकायतकर्ता एवं आरोपी अधिकारी के साथ सारांश सुनवाई करेगी.
(4)   यह पीठ दैनिक आधार पर सुनवाई करेगी और आरोपी सरकारी सेवकों पर एक या अधिक छोटे और बड़े दण्ड लगाते हुए आदेश जारी करेगी.
परन्तु ये आदेश पीठ गठित करने के एक माह के अन्दर जारी किये जाएंगे।
साथ ही यह भी कि ऐसे आदेश समुचित निनियोक्ता प्राधिकरण को सिफारिश के स्वरूप में होंगे।
(5)   पीठ के आदेश के खिलाफ मुख्य सतर्कता अधिकारी के समक्ष अपील की जा सकेगी, जोकि आरोपी, शिकायतकर्ता एवं पूछताछ करने वाले सतर्कता अधिकारी को सुनवाई का वाजिब अवसर देने के बाद, अधिकतम एक माह के अन्दर अपना आदेश जारी करेगा.


लोकपाल में कर्मचारी और स्टाफ एवं अधिकारी

22.
मुख्य सतर्कता अधिकारी:
(1)   प्रत्येक लोक प्राधिकरण में एक मुख्य सतर्कता अधिकारी होगा जिसका चयन और नियुक्ति लोकपाल द्वारा की जाएगी.
(2)   वह सम्बन्धित लोक प्राधिकरण से नहीं होगा.
(3)    वह एक ईमानदार निष्ठावान और भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय कार्रवाई करने में योग्य व्यक्ति होगा. 
(4)    वह किसी भी लोक प्राधिकरण के खिलाफ शिकायत स्वीकार करने के लिए उतरादायी होगा और शिकायत प्राप्त होने के अधिकतम दो दिन के भीतर सम्बन्धित लोक अधिकारी के पास उसे स्थानान्तरित करेगा. 
(5)   लोकपाल द्वारा समय-समय पर दिए गए दायित्वों के निर्वाह के लिए वह उत्तरदायी होगा, जिनमें,  लोकपाल द्वारा समय-समय पर निर्धारित किए गए तरीके से, शिकायतों का निपटान भी शामिल है.
परन्तु जिन शिकायतों के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत जांच आवश्यक है, उन्हें लोकपाल के जांच सम्भाग को स्थानान्तरित किया जाएगा. 
साथ ही यह भी कि, संयुक्त सचिव या उससे ऊपर स्तर के अधिकारियों के खिलाफ, काम पूरा न होने की शिकायतों के अतिरिक्त परिवादों को मुख्य सतर्कता अधिकारी नहीं देखेगा और उन्हें लोकपाल को स्थानान्तरित किया जाएगा, जो कि किन्ही तीन अन्य प्राधिकारणों के मुख्य सतर्कता अधिकारियों की एक कमेटी गठित करेगा जो इन शिकायतों की जांच करेगी.

(6)   अगर किसी नागरिक को जन शिकायत अधिकारी से इस अधिनियम की धारा 21 के तहत सन्तोषजनक निवारण नहीं मिलता है तो लोकपाल की ओर से मुख्य सतर्कता अधिकारी सभी शिकायतों को प्राप्त करेगा और उसका निपटान करेगा.
(7)   लोकपाल के निर्णय के अनुसार समय-समय पर कुछ सतर्कता अधिकारियों की नियुक्ति मुख्य सतर्कता अधिकारी के अधीन की जाएगी. 
(8)   सतर्कता अधिकारियों एवं मुख्य सतर्कता अधिकारी को ऐसे मामलों में लोकपाल द्वारा केन्द्रीय नागरिक सेवा (आचरण) नियम के अन्तर्गत और समय समय पर लोकपाल द्वारा तय किये जाने वाले नियमों के मुताबिक पूछताछ करने एवं जुर्माना लगाने का अधिकार होगा। 

23. लोकपाल के कर्मचारी इत्यादि
(1)   इस अधिनियम के अन्तर्गत ऐसे अधिकारी एवं कर्मचारी होंगे जो इस अधिनियम के अन्तर्गत लोकपाल को अपने कार्य को पूरा करने में मदद करने के लिए निर्धारित किये जा सकते हैं।
(2)   अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संख्या एवं श्रेणी का निर्णय लोकपाल द्वारा किया जाएगा।
(3)   उप-अनुच्छेद (1) में वर्णित अधिकरियों, एवं कर्मचारियों की श्रेणियां, भर्ती एवं सेवा की शर्तें वे होंगी जो कि लोकपाल द्वारा निर्धारित की जा सकती हैं, इनमें विशेष शर्तें या विशेष वेतन शामिल हैं जो कि निडर होकर अपना कर्र्तव्य निभाने के लिए सक्षम बनाने के लिए जरूरी हो सकती हैं।
परन्तु यह कि जिस भी अधिकारी की निष्ठा सन्देहास्पद हो, उसे लोकपाल में नियुक्त करने के बारे में विचार नहीं किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त यह भी कि सभी अधिकारी एवं कर्मचारी, जो कि लोकपाल में प्रतिनियुक्ति पर या किसी तरह से काम करते हैं, इस धारा के अन्तर्गत निर्धारित एकसमान नियमों एवं शर्तों के योग्य होंगे।  
(4)   उप-अनुच्छेद (1) के प्रावधानों के प्रति पूर्वाग्रह के बगैर, इस अधिनियम के अन्तर्गत जांच करने के उद्देश्य से लोकपाल निम्न की सेवाएं ले सकता है -
क.     केन्द्र सरकार के किसी अधिकारी या जांच एजेंसी; या
ख.     किसी अन्य सरकार की पूर्व सहमति से उनका कोई अधिकारी या जांच एजेंसी; या
ग.      निजी व्यक्ति सहित, कोई व्यक्ति, या कोई अन्य एजेंसी।

(5)   इस उप-अनुच्छेद में जिक्र किये गये अधिकारी एवं कर्मचारी लोकपाल के प्रशासनिक एवं अनुशासनिक नियन्त्रण में होंगे।
(6)   लोकपाल को अपने अधिकारी चुनने की शक्ति होगी। लोकपाल सरकारी एजेंसियों से तय समय के लिए प्रतिनियुक्ति पर अधिकारी प्राप्त कर सकता है या अन्य सरकारी एजेंसियों से स्थायी आधार पर अधिकारी प्राप्त कर सकता है या स्थायी आधार पर नियत समय के लिए बाहर से व्यक्ति नियुक्त कर सकता है।
(7)   कर्मचारी एवं अधिकारी ऐसे वेतनमान एवं भत्ते के हकदार होंगे, जो कि केन्द्र सरकार के साधारण वेतनमान से अलग एवं ज्यादा हो सकता है, जो कि समय समय पर लोकपाल द्वारा प्रधानमन्त्री के साथ विचार-विमर्श से तय किया जाएगा, ताकि लोकपाल में काम करने के लिए ईमानदार एवं सक्षम लोग आकर्षित हों।
(8)   लोकपाल अपने सम्पूर्ण बजटीय बाधाओं के अन्तर्गत, अपने काम के बोझ के अनुसार एवं कार्यरत स्टाफों के सेवा की शर्तों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्तरों पर अपने कर्मचारी कम करने या बढ़ाने के लिए सक्षम होगा।

24. निरस्त व बचाव करना-
(1) केन्द्रीय सर्तकता आयोग अधिनियम निष्प्रभावी हो जाएगा.
(2) निरस्त होने के बावजूद, इस अधिनियम के अन्तर्गत हुए कोई कार्य या चीज इस अधिनियम के अन्तर्गत की हुई समझी जाएंगी और इस अधिनियम के समतुल्य प्रावधानों के अन्तर्गत जारी और पूरी की जा सकती है।
(3) केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष लंबित सभी पूछताछ एवं जांच और अन्य अनुशासनात्मक कार्यवाही और जिनका निपटारा नहीं हुआ है, वे लोकपाल को हस्तान्तरित की जाएंगी और जारी रहेंगी यदि वे इस अधिनियम के अंतर्गत उनके समक्ष शुरू होती हैं।
(4) किसी अधिनियम में कुछ व्यवस्था भी होने के बावजूद, केन्द्रीय सतर्कता आयोग के सचिव एवं अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का पद समाप्त किया जाता है और इसके बाद वे लोकपाल के सचिव एवं अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के तौर पर नियुक्त किये जाते हैं। उस सचिव, अधिकारियों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं सेवा की अन्य नियम व शर्तें, जब तक कि उन्हें बदला न जाए, वहीं होंगी जो इस अधिनियम में शुरू करने के ठीक पहले वे हकदार रहे हैं। 
(5) केन्द्र सरकार के सभी विभागों, केन्द्र सरकार के मन्त्रालयों, किसी केन्द्रीय अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित निगम, सरकारी कम्पनियां, केन्द्र सरकार की या उनके द्वारा नियन्त्रित सोसायटी एवं स्थानीय प्राधिकरण के नियन्त्रण के अन्तर्गत सभी सतर्कता प्रशासन, सभी उद्देश्यों के लिए अपने अधिकारियों, सम्पत्तियों एवं दायित्त्वों सहित लोकपाल को हस्तान्तरित हो जाएंगे। 
(6) उप-अनुच्छेद (5) में विर्णत एजेंसियों की सतर्कता शाखा में कार्यरत अधिकारी लोकपाल में स्थानान्तरित किये जाने वाले तारीख से पांच साल के लिए प्रतिनियुक्ति पर समझे जाएंगे। जबकि, लोकपाल उनमें से किसी को भी व कभी भी उनकी वापसी कर सकता है।
(7) उप-अनुच्छेद (5) के अन्तर्गत लोकपाल को स्थानान्तरित हुए अधिकारियों के विभाग का स्थानान्तरित अधिकारियों के प्रशासन एवं कार्य पर कोई भी नियन्त्रण बन्द हो जाएगा।
(8) लोकपाल अधिकारियों को एक के बाद बदलते रहेंगे और और हरेक विभाग का सतर्कता शाखा इस तरह बनाएंगे कि उसी विभाग का कोई अधिकारी उसी विभाग के सतर्कता कार्य के लिए नियुक्त न हो। 
(9) वह व्यक्ति लोकपाल के साथ नियुक्त नहीं होगा जिन पर विचार करते समय उनके खिलाफ कोई भी सतर्कता पूछताछ या आपराधिक मामला लंबित या विचाराधीन हो।

25. लोकपाल की अन्वेषण शाखा-
(1)   लोकपाल में एक अन्वेषण शाखा होगी. 
(2)   भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के धारा 17 के प्रावधानों के बावजूद लोकपाल के स्तर निर्धारित किए गए अन्वेषण शाखा के ऐसे अधिकारी इस अधिनियम के अधीन शिकायतों के जांच के सिलसिले में पूरे देश में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं. उन्हें वे सभी अधिकार, कर्र्तव्य, विशेषाधिकार और दायित्व हासिल होंगे जो किसी घटना की जांच के लिए दिल्ली विशेष  पुलिस स्थापना के सदस्यों को मिले हुए हैं.
(3)   दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना को का वह भाग जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत सम्बन्धित अपराधों के अन्वेषण और अभियोजन के लिए प्रतिबद्ध होता है, अपने कर्मचारियों, साधनों और देनदारियों समेत सभी प्रयोजनों  के लिए लोकपाल को हस्तान्तरित कर दिया जाएगा. 
(4)   उप-धारा (3) के तहत स्थानान्तरित किया गया दिल्ली विशेष पुलिस विभाग, लोकपाल के सतर्कता विभाग का हिस्सा होगा. 
(5)   केन्द्रीय सरकार का उस स्थानान्तरित प्रभाग व उनके कर्मचारियों पर कोई अधिकार नहीं होगा. 
(6)   स्थानान्तरित कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य नियम व शर्तें उप धारा (3) के तहत वहीं होंगी, जिनके वे इस अधिनियम के प्रारम्भ होने से तुरन्त पहले योग्य थे. 
(7)   वे सभी मामले जो कि दिल्ली विशेष पुलिस प्रभाग के पास थे, वे सभी उप धारा (3) के तहत लोकपाल को स्थानान्तरित हो जाएंगे. 
(8)   किसी मामले की जांच के पूरा होने के बाद, उस मामले को अन्वेषण शाखा लोकपाल की उपयुक्त पीठ के सामने प्रस्तुत करेगी ताकि यह निर्णय लिया जा सके कि उस पर अभियोजन करने की इजाजत है या नहीं.    

25क. अभियोजन शाखा-  लोकपाल की एक अभियोजन शाखा होगी. किसी मामले में जांच पूरी होने के बाद, जांच शाखा इसे अभियोजन शाखा को अग्रसित कर देगी, जिस पर अभियोजन करने या नहीं करने का निर्णय अभियोजन शाखा लेगी.
परन्तु यह कि लोकपाल द्वारा चिन्हित विशिष्ट श्रेणी के मामलों में लोकपाल की पीठ द्वारा यह निर्णय लिया जाएगा कि इसके अभियोजन की अनुमति देनी है या इंकार करना है.
यह भी कि जांच शाखा से मामला मिलने के दो सप्ताह के भीतर अभियोजन शाखा अभियोजन की अनुमति देने या नहीं देने का निर्णय लेगी, ऐसा नहीं होने की स्थिति में मान लिया जाएगा कि अभियोजन शाखा अभियोजन शुरू करने जा रही है.

26. लोकपाल के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत:

(1) लोकपाल के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ की गई शिकायत की जांच, इस उपखंड के प्रावधानों के अनुसार , अलग से की जाएगी.
(2) ऐसी शिकायत अपराध के रूप में आरोपित, अथवा भ्रष्टाचार अधिनियम के अनुसार या दुराचार या बेईमानी के मामले की हो सकती है.
(3) लोकपाल में जैसे ही शिकायत दर्ज की जाएगी, शिकायत की सामग्री सहित लोकपाल की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाएगा,
परन्तु शिकायतकर्ता अगर चाहेगा तो उसकी पहचान नहीं बताई जाएगी. 
(4) हर शिकायत की जांच, उसके मिलने के एक माह के भीतर पूरी कर ली जाएगी. 
(5) किसी अधिकारी पर लगे आरोपों की जांच भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107, 166, 167, 177, 182, 191, 199, 200, 201, 204, 217, 218, 219, 463, 464, 468, 469, 470, 471, 474 के तहत की जाएगी.  
(6) अगर जांच के दौरान ऐसा लगा कि लगाए गए आरोप सही हैं तो उस अधिकारी से सारे अधिकार और दायित्व छीन लिए जाएंगे और उसे निलम्बित कर दिया जाएगा. 
(7) यदि पूछताछ या जांच पूरी होने के बाद, उस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 के अन्तर्गत अभियोग चलाने का निर्णय लिया जाता है या वह किसी दुर्व्यवहार अथवा गलत तरीके से पूछताछ या जांच करने का दोषी पाया जाता है तो, वह व्यक्ति आगे से लोकपाल के साथ काम नहीं करेगा। यदि वह व्यक्ति लोकपाल में नौकरी पर है तो लोकपाल उस व्यक्ति को नौकरी से निकाल देगा, या यदि वह प्रतिनियुक्ति पर है तो, उसे नौकरी से निकालने की सिफारिश के साथ वापस भेज दिया जाएगा।
परन्तु इस अनुच्छेद के अन्तर्गत आरोपी व्यक्ति का पक्ष सुनने का वाजिब अवसर दिये बगैर कोई आदेश जारी नहीं किया जाएगा।
परन्तु इस अनुच्छेद के अन्तर्गत जांच पूरी करने के लिए 15 दिनों के अन्दर वह आदेश जारी कर दिया जाएगा।
(8) अपने स्टाफ एवं कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतों के मामले के सुनवाई तीन सदस्यीय न्यायपीठ करेगी। जबकि, मुख्य सतर्कता अधिकारी या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारियों के लिए, लोकपाल की पूर्ण पीठ द्वारा सुनवाई की जाएगी।
(9) लोकपाल यह सुनिश्चित करने के लिए सारे कदम उठायेगा ताकि उसके अपने स्टाफ एवं कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतों पर सभी पूछताछ एवं जांच अति पारदर्शी एवं ईमानदारी पूर्ण तरीके से की जाए।
                                                        
27. बचाव:

(1)  किसी अध्यक्ष या सदस्य या किसी अधिकारी के खिलाफ, कर्मचारी, एजेंसी, या व्यक्ति जो अपनी ड्यूटी करते समय अपना दायित्व नेकनीयती से निभाता है तो उसके खिलाफ इस निदिर्ष्ट धारा 14( 4) के तहत गलत आरोप लगाने पर कोई मुकदमा, अभियोग या अन्य कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी.  
विविध 

28. सार्वजनिक अधिकारी अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा प्रस्तुत करें: 
(1)  अनुच्छेद 2(12) (क) से (ग) में विर्णत के अलावा, प्रत्येक लोक सेवक इस अधिनियम के शुरू होने के तीन माह के अन्दर और उसके बाद हर साल 30 जून के पहले, लोकपाल द्वारा निर्धारित स्वरूप में, अपने लोक प्राधिकरण के प्रमुख को, अपनी एवं जो अपने परिवार के सदस्यों की सम्पत्तियों एवं जिम्मेदारियों का ब्यौरा प्रस्तुत करेगा। अनुच्छेद 2(12) (क) से (ग) में विर्णत लोकसेवक, लोकपाल को उपरोक्त समय अवधि में, लोकपाल द्वारा निर्धारित स्वरूप में रिटर्न प्रस्तुत करेगा, जिसमें उसकी आय के स्रोत भी शामिल होंगे।
(2)  हरेक लोक प्राधिकरण का प्रमुख यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे सभी ब्यौरे उस वर्ष के 31 अगस्त तक वेबसाइट पर डाल दिये जाएं।
(3)  यदि उस लोक प्राधिकरण के प्रमुख को उप-अनुच्छेद (1) में निर्धारित समय में किसी लोक सेवक से ऐसा ब्यौरा प्राप्त नहीं होता है तो, उस लोक प्राधिकरण का प्रमुख सम्बन्धित लोक सेवक को ऐसा तत्काल करने का निर्देश देगा। यदि अगले एक माह में, सम्बन्धित लोक सेवक ऐसा ब्यौरा प्रस्तुत नहीं करता है तो, प्रमुख उस लोक सेवक द्वारा वह ब्यौरा प्रस्तुत करने तक उसका वेतन एवं भत्ता रोक देगा.
स्पष्टीकरण - इस अनुच्छेद में ``लोक सेवक का परिवार´´ का मतलब पत्नी एवं उसके बच्चे और लोक सेवक के माता पिता, जो उन पर आश्रित हों।
(4)  लोकपाल उस लोक सेवक के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 176 के अन्तर्गत अभियोग शुरू कर सकता है।

28क. सम्पत्तियों को भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त किया गया समझा जाएगा: 
(1)  किसी लोक सेवक या उसके परिवार के किसी सदस्य के स्वामित्व में ऐसी कोई चल या अचल सम्पत्ति पायी जाती है, जिसे उस लोक सेवक द्वारा इस अनुच्छेद के अन्तर्गत घोषित नहीं की गई थी जो कि इस अनुच्छेद के अन्तर्गत पिछली रिटर्न दाखिल करने से पहले हासिल की गई हैं, तो उसे भ्रष्ट तरीके से अर्जित किया गया समझा जाएगा।
(2) किसी लोक सेवक या उसके परिवार के किसी सदस्य के कब्जे में ऐसी कोई चल या अचल सम्पत्ति पायी जाती है, जो कि इस अनुच्छेद के अन्तर्गत उस लोक सेवक द्वारा घोषित नहीं की गई थी, वह उस लोक सेवक के स्वामित्व में माना जाएगा एवं वह लोक सेवक द्वारा भ्रष्ट तरीके के माध्यम से हासिल किया हुआ समझा जाएगा, उसे अन्यथा साबित करने का दायित्व लोक सेवक का होगा।
(3) किसी लोक सेवक को 15 दिनों के अन्दर इस बात का स्पष्टीकरण देने का एक अवसर दिया जाएगा, कि – 
क.     इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (1) के अन्तर्गत सम्पत्ति होने की स्थिति में, क्या उसने किसी भी पिछले सालों में उस सम्पत्ति को घोषित किया था। 
ख.     इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (2) के अन्तर्गत सम्पत्ति होने की स्थिति में, स्पष्टीकरण देने के लिए कि उसे लोक सेवक के स्वामित्व में क्यों नहीं समझा जाना चाहिए।

(4) यदि लोक सेवक इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (3) के अन्तर्गत सन्तुष्टिपूर्ण जवाब प्रदान करने में विफल रहता है तो, लोकपाल ऐसी सभी सम्पत्तियों को जब्त कर लेगा। 
(5) इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (3) के अन्तर्गत जिसके लिए नोटिस जारी की जाती है, उन सम्पत्तियों का हस्तान्तरण नोटिस जारी करने की तिथि के बाद अमान्य समझी जाएंगी।
(6) लोकपाल, उचित कार्रवाई के लिए ऐसी जानकारी आय कर विभाग को सूचित करेगा.
(7) लोकपाल के उस आदेश के खिलाफ अपील उपयुक्त अधिकार क्षेत्र के उच्च न्यायालय में किया जाएगा, जो अपील दाखिल करने के तीन माह के अन्दर मामले का निर्णय करेगा-
परन्तु, उप-अनुच्छेद (4) के अन्तर्गत लोकपाल के आदेश के 30 दिन बीत जाने के बाद किसी अपील पर विचार नहीं किया जाएगा.
(8) इस अनुच्छेद के अन्तर्गत जब्त समस्त सम्पत्तियों को नीलामी में सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को दी जाएगी। उसकी आधी आय को लोकपाल द्वारा भारत के समेकित कोष में जमा किया जाएगा। शेष रकम को लोकपाल द्वारा अपने खुद के प्रशासन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
परन्तु यदि किसी मामले में अपील दाखिल की गई है तो अपील के निपटारे तक कोई नीलामी नहीं होगी.

28ख (1) संसद के किसी चुनाव के पूरा होने के तीन माह के बाद, लोकपाल उम्मीदवार द्वारा भारत के चुनाव आयोग के पास प्रस्तुत सम्पत्ति के ब्यौरे की तुलना आयकर विभाग के उपलब्ध उसके आय के स्रोत से करेगा। जिन मामलों ज्ञात स्रोतों से ज्यादा सम्पत्ति पायी जाती है, वह उपयुक्त कार्यवाही शुरू करेगा।
(2) किसी संसद सदस्य के खिलाफ यह आरोप लगता है कि उसने संसद में मतदान करने या संसद में सवाल उठाने या अन्य किसी विषय सहित संसद के किसी व्यवस्था में रिश्वत ली है तो, संसद सदस्य जिस सदन का सदस्य है तदानुसार, लोकसभा स्पीकर या राज्य सभा अध्यक्ष के पास शिकायत की जा सकती है. ऐसी शिकायतों पर निम्न तरीके से सुनवाई होगी:
क.     शिकायत प्राप्त होने के एक माह के अन्दर उसे आचारनीति समिति के पास आगे भेजा जाएगा।
ख.     आचारनीति समिति एक माह के अन्दर निर्णय करेगी कि उस पर क्या किया जाना है।

29 प्रतिनिधियों को कार्यभार सौंपने की शक्ति:  
(1)   लोकपाल अपने मातहतों को शक्तियां और कार्य सौंपने का अधिकारी होगा. 
(2)   ऐसे अधिकारियों की ओर से अपनी शक्तियों का प्रयोग कर जो कार्य किए जाएगा, उसे लोकपाल द्वारा किया माना जाएगा.
परन्तु नीचे लिखे गए कार्य पीठ द्वारा ही पूरे किए जाएंगे और इन्हें किसी और पर प्रत्यायोजित नहीं किया जाएगा. 
क.     किसी मामले में अभियोजन शुरू करने का आदेश देना. 
ख.     सीसीएस संचालित नियमों के अनुसार किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त करना. 
ग.      अनुभाग 10 के अन्तर्गत लोकपाल के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत पर आदेश जारी करना. 
घ.      संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ मामलों की शिकायतों पर आदेश जारी करना.

30. समय सीमा: 
(1)   अनुभाग 9 के उपभाग (1) के अंर्तगत इस अधिनियम में प्रारम्भिक जांच शिकायत प्राप्त होने के एक महीने में पूरी हो जानी चाहिए.
परन्तु अगर जांच निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी नहीं होती है, तो जांच अधिकारी को इसका कारण बताने के लिए ज़िम्मेदार माना जाएगा. 
(2)    किसी आरोप की जांच शिकायत मिलने से छह महीने और किसी भी परिस्थिति में एक वर्ष के भीतर पूरी की जाएगी . 
(3)   लोकपाल की ओर से दायर अभियोजन पर सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी हो जानी चाहिए. स्थगन अति विशिष्ट परिस्थितियों में ही दिए जाने चाहिए.
30क. पारदर्शिता और सूचना के अधिकार के लिए प्रार्थना पत्र: 
(1)   लोकपाल हर सूचना को वेबसाइट पर मुहैया कराने का हर सम्भव प्रयास करेगा. 
(2)   किसी मामले की जांच पूरी हो जाने के बाद, उससे जुड़े सभी दस्तावेज आम जनता के लिए उपलब्ध होंगे. लोकपाल को यह दस्तावेज वेबसाइट पर डालने का यथासम्भव प्रयास करना होगा.
परन्तु, जानकारी देते समय इस तथ्य का ध्यान रखा जाए कि जिस व्यक्ति ने अपनी पहचान छुपाने की बात कही है और कोई ऐसी सूचना जिससे देश की आन्तरिक और बाह्य सुरक्षा को खतरा हो, को प्रकट नहीं किया जाएगा.

31. विशिष्ट शिकायतों पर जुर्माना: 
(1)   इस अधिनियम में उल्लेखित होने के बावजूद, यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत कोई ऐसी शिकायत करता है, जिसमें कोई आधार या साक्ष्य का अभाव हो और वह किसी प्राधिकारों को तंग करने के लिए लोकपाल को की गई हो, तो, लोकपाल शिकायतकर्ता पर जो उचित समझे वह जुर्माना लगा सकता है, लेकिन किसी एक मामले में कुल जुर्माना रुपये एक लाख से ज्यादा नहीं होगा।
परन्तु सुनवाई का वाजिब अवसर दिये बगैर कोई जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।
इसके साथ ही यह भी कि सिर्फ इसलिए कि इस अधिनियम के अन्तर्गत जांच के बाद मामला साबित नहीं हो पाया हो, तो इस अनुच्छेद के उद्देश्य के लिए शिकायतकर्ता के खिलाफ ऐसा नहीं किया जाएगा.
(2)   वह जुर्माना भूमि राजस्व अधिनियम के अन्तर्गत बकाया अनुसार वसूले जा सकने योग्य होगा.
(3)    इस अधिनियम के अन्तर्गत एक बार जो शिकायत या आरोप कर दी गई हो उसे वापस लेने की अनुमति नहीं होगी.

31क. निवारक उपाय: 
(1)   लोकपाल, नियमित समय अन्तराल पर, अपने अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाले सभी लोक प्राधिकरण के कार्य पद्धति का या तो स्वयं अथवा किसी अन्य के माध्यम से अध्ययन करेगा और सम्बन्धित लोक प्राधिकरण से विचार-विमर्श करके, ऐसे निर्देश जारी करेगा जिसे वह भविष्य में भ्रष्टाचार की घटनाओं को रोकने के लिए उचित समझे।
(2)   लोकपाल इस अधिनियम के बारे जागरूकता उत्पन्न करने एवं आम जनता को भ्रष्टाचार रोकने में शामिल करने के लिए भी उत्तरदायी होगा। 

31ख. पुरस्योजना: 
(1)   लोकपाल को सरकार के भीतर और बाहर भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्तियों को पुरस्कृत कर, आम जनता को प्रोत्साहित करना चाहिए. 
(2)   लोकपाल को इस तरह की योजना लागू करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए जिसमें शिकायतकर्ता को आर्थिक तौर पर भी पुरस्कृत किया जा सके. लेकिन, यह पुरस्कार राशि भ्रष्टाचार से होने वाले नुकसान की 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए.

32. कानून बनाने का अधिकार: 

(1)   सरकार अधिकारिक गजट में अधिसूचना के द्वारा इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभाव में लाने के उद्देश्य से नियम बनाएगी।
परन्तु ऐसे नियम केवल लोकपाल से विचार-विमर्श करके ही बनाये जाएंगे।
(2)   खासकर, एवं पूर्वगामी प्रावधानों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बगैर, ऐसे नियम निम्न प्रदान कर सकते हैं :
क.     लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों को देय भत्ते, पेंशन और अन्य सेवा शर्तों के संबंध में;
ख.     अनुभाग 11 के उपभाग (2) के खण्ड (एच) के अन्तर्गत लोकपाल के पास एक सिविल अदालत की शक्तियां प्राप्त होनीं चाहिए. 
       (2क) लोकपाल को सुचारू रूप से चलाने के लिए लोकपाल को अपने नियम बनाने की छूट होनी चाहिए. 
क.     लोकपाल के स्टाफ और कर्मचारियों आदि के वेतन, भत्ते, भर्ती और अन्य सेवाओं के बारे में; 
ख.     लोकपाल में मामले दर्ज कराने और कार्यवाही शुरू करने की प्रक्रिया. 
ग.      इसके साथ ही कोई अन्य विषय, जिसमें इस अधिनियम के अंर्तगत कानून बनाना जरूरी हो.
(3)   इस अधिनियम के अन्तर्गत बने किसी नियम को पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ बनाया जा सकता है और जब ऐसा नियम बनाया जाता है तो संसद के दोनों सदनो के समक्ष वक्तव्य में नियम बनाने की वजह को स्पष्ट किया जाएगा. 
(4)   लोकपाल इस अधिनियम में विभिन्न प्रावधानों में वर्णित समय सीमा का कड़ाई से पालन करेगा. इसे हासिल करने के लिए, लोकपाल हरेक स्तर के पदाधिकारी के लिए मानक तय करेगा और कार्य के बोझ के अनुसार अतिरिक्त संख्या में पदाधिकारियों एवं बजट की जरूरत का आकलन करेगा.

32
क. यह लोकपाल का कर्र्तव्य होगा कि अपने स्टाफ को नियमित अन्तराल में प्रशिक्षित करे और उनके कौशल में सुधार के लिए अन्य सभी कदम उठाये और लोगों के साथ व्यवहार करने के सोच में बदलाव लाए।
लोकपाल को हर स्पर होने वाले कार्य के मानदण्डों को सूचीबद्ध करना होगा. इसके बाद कार्य की मात्रा को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त लोगों की भर्ती की जरूरत और बजट का हिसाब लगाना होगा. 

33. कठिनाइयों को दूर करना :- इस अधिनियम में कुछ भी होने के बावजूद, राष्ट्रपति, लोकपाल के साथ विचार-विमर्श करके या लोकपाल के निवेदन पर निम्न आदेश, ऐसे प्रावधान कर सकता है-
(1)   इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी संचालन में लाने के लिए
(2)   केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष लंबित पूछताछ एवं जांच को लोकपाल द्वारा जारी रखने के लिए।

34 . कानून बनाने की शक्ति :- संस्था के अबाध क्रियाकलाप एवं इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए लोकपाल को अपने विनियम बनाने का अधिकार होगा।

35. यह अधिनियम अन्य सभी कानूनों के प्रावधानों से सर्वोपरि होगा।